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भाषा के आयाम

आज के परिवेश में भाषा शिक्षक होने के नाते क्या हमें अब भी यही मानना चाहि‌ए कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम भर है? जब बच्चे पहली बार स्कूल में प्रवेश लेते हैं तो क्या वे खाली दिमाग लेकर आते हैं? या भाषा‌ई रूप से वयस्क होते हैं? क्या भाषा अध्यापक को पाठ पढ़ाने के लि‌ए केवल भाषा‌ई कौशलों की कुछ गतिविधियों का ज्ञान होना ही पर्याप्त है? या अपने ऐसे क‌ई तरह के नजरिये सोच-विचार, दृष्टिकोण विकसित करते हु‌ए हमें बच्चों के सर्वांगीण विकास की ओर कदम बढ़ाने चाहि‌ए। इस माड्यूल के तहत हम भाषा के आयाम मसलन भाषा के मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ, भाषा वैज्ञानिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण के साथ-साथ भाषा का अर्थ समझना, भाषा की प्रकृति अवं स्वरूप को समझते हु‌ए भाषा और समाज, भाव, अभिप्रेरना, अस्तित्व, संस्कृति और भाषा‌ई सौंदर्य आदि को समझेंगे । असल में हमें बच्चों को भाषा क्यों पढ़ानी चाहि‌ए यह भाषा शिक्षण के उद्देश्य से समझ पा‌एंगे। इसके साथ भाषा के सार्वत्रिक अंश को भी समझकर कक्षा में भाषा के प्रति बच्चों को देखने के दृष्टिकोण को लेकर यह मोड्यूल एक प्रयास है ।



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बहुभाषिकता एवं भाषा‌ई कौशल

बच्चा स्वाभाविक रूप से अपने घर और समाज के वातावरण से भाषा ग्रहण कर लेता है । बच्चों में भाषा धारण करने की जन्मजात क्षमता होती है । हम रोज़मर्रा के अनुभव से जानते हैं कि ज्यादातर बच्चे, स्कूल की शिक्षा की शुरु‌आत से पहले ही भाषा की जटिलता‌ओं और नियमों को आत्मसात कर पूर्ण भाषिक क्षमता रखते हैं। बहुभाषिकता, जो बच्चे की अस्मिता का निर्माण करती है और भारत के भाषा-परिदृश्य का विशिष्ट लक्षण है, उसका संसाधन के रूप में उपयोग कर कक्षा की कार्यनीति का हिस्सा बनाना तथा उसे लक्ष के रूप में रखना रचनात्मक भाषा शिक्षक का कार्य है । बहुभाषिकता और भाषा कक्षा, भाषा‌ई विमर्श मसलन बच्चों की शिक्षा में मातृभाषा का महत्व, संघ की भाषा, राज भाषा, राष्ट्रभाषा, त्रिभाषा सूत्र की सही समझ बनाने में यह प्रयास मददगार होगा। इससे कक्षा के साथ भाषा‌ई कौशलों को समझने में भी मदद मिलेगी।



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भाषा सीखने के दृष्टिकोण और सिद्धांत, संप्रेषण

बच्चों को स्वाभाविक तौर पर सीखने वालों की तरह पहचाने जाने की आवश्यकता है और बच्चे जो गतिविधियां करते हैं उसके फलस्वरूप पैदा होने वाले ज्ञान को स्थापित करते हैं । आम दिनचर्या में, विद्यालय से बाहर हम बच्चों की जिज्ञासा, खोजी व लगातार प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति देखते हैं । बच्चे अपने आस-पास की दुनिया से बहुत ही सक्रिय रूप से जुड़े रहते हैं । वे खोज-बीन करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, चीजों के साथ कार्य करते हैं, चीजें बनाते हैं और अर्थ गढ़ते हैं । इस मोड्यूल से गुजर कर शिक्षक की भूमिका, सीखने के सिद्धांत, भाषा अधिगम और शिक्षण, अपने पाठशाला में रचनात्मक शिक्षण और अनुवर्ग शिक्षा को लेकर चर्चा‌ए करेंगे और बच्चों के जीवन में एक चिंतनशील शिक्षक बनना कितना महत्वपूर्ण होता है? यह समझते हु‌ए कुछ अन्य कक्षा गतिविधियों के द्वारा संप्रेषण का महत्व समझ पायेंगे।



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साहित्य शिक्षण, आकलन और मूल्यांकन

क्या हम यह जानते हैं कि साहित्य को समाज का दर्पण क्यों कहा जाता है? इसके साथ हमें यह भी समझना जरूरी होगा कि भाषा शिक्षण में साहित्य का महत्व क्या है? साहित्य की विधा‌एँ क्या है और साहित्य शिक्षण के उद्देश्य क्या हैं? इस मॉड्यूल के तहत हम देखेंगे कि साहित्य क्या है? साहित्य की विधा‌एं-परिचयात्मक रूप से, साहित्य में बच्चों की रुचि कैसे बढ़ा‌ई जा सकती है? साहित्य और आकलन, मूल्यांकन, परीक्षा, सतत और व्यापक मूल्यांकन के तत्व, पढ़ना । साहित्य विधा‌ओं के अंरर्गत: नाटक, कहानी, एकांकी और आत्मकथा, निबंध, जीवनी, रेखाचित्र, यात्रावर्णन, व्यंग्यरचना और पत्रलेखन, आधुनिक और प्राचीन (भक्तिकाल) की कविता‌एं आदि । इसके साथ शिक्षण योजना के महत्व को भी समझ सकेंगे



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